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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रभाताय़ां तु शर्वर्यां तेषामक्लिष्टकर्मणाम् |  १   क
वनं यिय़ासतां विप्रास्तस्थुर्भिक्षाभुजोऽग्रतः |  १   ख
तानुवाच ततो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ||  १   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति