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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा स नृपः शोचन्निषसाद महीतले |  १४   क
तमध्यात्मरतिर्विद्वाञ्शौनको नाम वै द्विजः |  १४   ख
योगे साङ्ख्ये च कुशलो राजानमिदमव्रवीत् ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति