वन पर्व  अध्याय २

वैशम्पाय़न उवाच

श्रूय़तां चाभिधास्यामि जनकेन यथा पुरा |  १९   क
आत्मव्यवस्थानकरा गीताः श्लोका महात्मना ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति