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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं हि हृतसर्वस्वा हृतराज्या हृतश्रिय़ः |  २   क
फलमूलामिषाहारा वनं यास्याम दुःखिताः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति