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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
कोटराग्निर्यथाशेषं समूलं पादपं दहेत् |  २९   क
धर्मार्थिनं तथाल्पोऽपि रागदोषो विनाशय़ेत् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति