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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
वनं च दोषवहुलं वहुव्यालसरीसृपम् |  ३   क
परिक्लेशश्च वो मन्ये ध्रुवं तत्र भविष्यति ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति