वन पर्व  अध्याय २

वैशम्पाय़न उवाच

विप्रय़ोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमात् |  ३०   क
विरागं भजते जन्तुर्निर्वैरो निष्परिग्रहः ||  ३०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति