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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्स्नेहं स्वपक्षेभ्यो मित्रेभ्यो धनसञ्चय़ात् |  ३१   क
स्वशरीरसमुत्थं तु ज्ञानेन विनिवर्तय़ेत् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति