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सभा पर्व
अध्याय १४
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युधिष्ठिर उवाच
गृहे गृहे हि राजानः स्वस्य स्वस्य प्रिय़ङ्कराः |  २   क
न च साम्राज्यमाप्तास्ते सम्राट्शव्दो हि कृत्स्नभाक् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति