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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
अनाद्यन्ता तु सा तृष्णा अन्तर्देहगता नृणाम् |  ३६   क
विनाशय़ति सम्भूता अय़ोनिज इवानलः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति