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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणानां परिक्लेशो दैवतान्यपि सादय़ेत् |  ४   क
किं पुनर्मामितो विप्रा निवर्तध्वं यथेष्टतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति