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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्थ एव हि केषाञ्चिदनर्थो भविता नृणाम् |  ४०   क
अर्थश्रेय़सि चासक्तो न श्रेय़ो विन्दते नरः |  ४०   ख
तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः ||  ४०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति