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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चापि तेऽसुखाः |  ४३   क
दुःखेन चाधिगम्यन्ते तेषां नाशं न चिन्तय़ेत् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति