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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
असन्तोषपरा मूढाः सन्तोषं यान्ति पण्डिताः |  ४४   क
अन्तो नास्ति पिपासाय़ाः सन्तोषः परमं सुखम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति