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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
त्यजेत सञ्चय़ांस्तस्मात्तज्जं क्लेशं सहेत कः |  ४६   क
न हि सञ्चय़वान्कश्चिद्दृश्यते निरुपद्रवः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति