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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
अतश्च धर्मिभिः पुम्भिरनीहार्थः प्रशस्यते |  ४७   क
प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति