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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
युधिष्ठिरैवमर्थेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि |  ४८   क
धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थतः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति