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वन पर्व
अध्याय २
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युधिष्ठिर उवाच
नात्मार्थं पाचय़ेदन्नं न वृथा घातय़ेत्पशून् |  ५६   क
न च तत्स्वय़मश्नीय़ाद्विधिवद्यन्न निर्वपेत् ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति