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वन पर्व
अध्याय २
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युधिष्ठिर उवाच
श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वय़ोभ्यश्चावपेद्भुवि |  ५७   क
वैश्वदेवं हि नामैतत्साय़म्प्रातर्विधीय़ते ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति