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वन पर्व
अध्याय २
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युधिष्ठिर उवाच
विघसाशी भवेत्तस्मान्नित्यं चामृतभोजनः |  ५८   क
विघसं भृत्यशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति