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वन पर्व
अध्याय २
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युधिष्ठिर उवाच
एतां यो वर्तते वृत्तिं वर्तमानो गृहाश्रमे |  ५९   क
तस्य धर्मं परं प्राहुः कथं वा विप्र मन्यसे ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति