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वन पर्व
अध्याय २
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शौनक उवाच
ह्रिय़ते वुध्यमानोऽपि नरो हारिभिरिन्द्रिय़ैः |  ६२   क
विमूढसञ्ज्ञो दुष्टाश्वैरुद्भ्रान्तैरिव सारथिः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति