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वन पर्व
अध्याय २
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शौनक उवाच
व्रह्मादिषु तृणान्तेषु हूतेषु परिवर्तते |  ६८   क
जले भुवि तथाकाशे जाय़मानः पुनः पुनः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति