विराट पर्व  अध्याय २

अर्जुन उवाच

प्रतिज्ञां षण्ढकोऽस्मीति करिष्यामि महीपते |  २१   क
ज्याघातौ हि महान्तौ मे संवर्तुं नृप दुष्करौ ||  २१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति