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विराट पर्व
अध्याय २
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भीम उवाच
ये च केचिन्निय़ोत्स्यन्ति समाजेषु निय़ोधकाः |  ५   क
तानहं निहनिष्यामि प्रीतिं तस्य विवर्धय़न् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति