द्रोण पर्व  अध्याय ९६

सञ्जय़ उवाच

स रथेन चरन्मार्गान्धनुरभ्रामय़द्भृशम् |  ३   क
रुक्मपृष्ठं महावेगं रुक्मचन्द्रकसङ्कुलम् ||  ३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति