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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य पाटय़तः काष्ठं स्वेदो वै समजाय़त |  २   क
व्याय़ामेन च तेनास्य जज्ञे शिरसि वेदना ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति