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द्रोण पर्व
अध्याय २
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कर्ण उवाच
जगत्यनित्ये सततं प्रधावति; प्रचिन्तय़न्नस्थिरमद्य लक्षय़े |  ११   क
भवत्सु तिष्ठत्स्विह पातितो रणे; गिरिप्रकाशः कुरुपुङ्गवः कथम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति