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द्रोण पर्व
अध्याय २
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कर्ण उवाच
समाहितं चात्मनि भारमीदृशं; जगत्तथानित्यमिदं च लक्षय़े |  १४   क
निपातितं चाहवशौण्डमाहवे; कथं नु कुर्यामहमाहवे भय़म् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति