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द्रोण पर्व
अध्याय २
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कर्ण उवाच
यमौ रणे यत्र यमोपमौ वले; ससात्यकिर्यत्र च देवकीसुतः |  १७   क
न तद्वलं कापुरुषोऽभ्युपेय़िवा; न्निवर्तते मृत्युमुखादिवासकृत् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति