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द्रोण पर्व
अध्याय २
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सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु कर्णः पुरुषेन्द्रमच्युतं; निपातितं शान्तनवं महारथम् |  २   क
अथोपाय़ात्तूर्णममित्रकर्शनो; धनुर्धराणां प्रवरस्तदा वृषः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति