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द्रोण पर्व
अध्याय २
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कर्ण उवाच
कर्तास्म्येतत्सत्पुरुषार्यकर्म; त्यक्त्वा प्राणाननुय़ास्यामि भीष्मम् |  २०   क
सर्वान्सङ्ख्ये शत्रुसङ्घान्हनिष्ये; हतस्तैर्वा वीरलोकं गमिष्ये ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति