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वन पर्व
अध्याय ६८
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वृहदश्व उवाच
विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्टसुखेन च |  ९   क
यत्सा तेन परित्यक्ता तत्र न क्रोद्धुमर्हति ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति