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द्रोण पर्व
अध्याय २
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कर्ण उवाच
एतां रौक्मीं नागकक्ष्यां च जैत्रीं; जैत्रं च मे ध्वजमिन्दीवराभम् |  २५   क
श्लक्ष्णैर्वस्त्रैर्विप्रमृज्यानय़स्व; चित्रां मालां चात्र वद्ध्वा सजालाम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति