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द्रोण पर्व
अध्याय २
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कर्ण उवाच
प्रय़ाहि सूताशु यतः किरीटी; वृकोदरो धर्मसुतो यमौ च |  ३०   क
तान्वा हनिष्यामि समेत्य सङ्ख्ये; भीष्माय़ वैष्यामि हतो द्विषद्भिः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति