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द्रोण पर्व
अध्याय २
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कर्ण उवाच
न त्वेवाहं न गमिष्यामि तेषां; मध्ये शूराणां तत्तथाहं व्रवीमि |  ३३   क
मित्रद्रुहो दुर्वलभक्तय़ो ये; पापात्मानो न ममैते सहाय़ाः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति