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द्रोण पर्व
अध्याय २
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सञ्जय़ उवाच
स सिद्धिमन्तं रथमुत्तमं दृढं; सकूवरं हेमपरिष्कृतं शुभम् |  ३४   क
पताकिनं वातजवैर्हय़ोत्तमै; र्युक्तं समास्थाय़ यय़ौ जय़ाय़ ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति