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द्रोण पर्व
अध्याय २
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कर्ण उवाच
व्रह्मद्विषघ्ने सततं कृतज्ञे; सनातनं चन्द्रमसीव लक्ष्म |  ५   क
स चेत्प्रशान्तः परवीरहन्ता; मन्ये हतानेव हि सर्वय़ोधान् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति