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द्रोण पर्व
अध्याय २
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सञ्जय़ उवाच
महाप्रभावे वरदे निपातिते; लोकश्रेष्ठे शान्तनवे महौजसि |  ८   क
पराजितेषु भरतेषु दुर्मनाः; कर्णो भृशं न्यश्वसदश्रु वर्तय़न् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति