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कर्ण पर्व
अध्याय २
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सञ्जय़ उवाच
तस्येषुधाराः शतशः प्रादुरासञ्शरासनात् |  १९   क
अग्रे पुङ्खे च संसक्ता यथा भ्रमरपङ्क्तय़ः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति