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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
भगदत्तः कृपः शल्य आवन्त्योऽथ जय़द्रथः |  १६   क
भूरिश्रवाः सोमदत्तो महाराजोऽथ वाह्लिकः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति