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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
अश्वत्थामा च भोजश्च मागधश्च महावलः |  १७   क
वृहद्वलश्च काशीशः शकुनिश्चापि सौवलः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति