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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
सधूममिव निःश्वस्य करौ धुन्वन्पुनः पुनः |  २   क
विचिन्त्य च महाराज ततो वचनमव्रवीत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति