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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
एकोऽप्येषां महाराज समर्थः संनिवारणे |  २४   क
समरे पाण्डवेय़ानां सङ्क्रुद्धो ह्यभिधावताम् |  २४   ख
किं पुनः सहिता वीराः कृतवैराश्च पाण्डवैः ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति