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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
अथ वा सर्व एवैते पाण्डवस्यानुय़ाय़िभिः |  २५   क
योत्स्यन्ति सह राजेन्द्र हनिष्यन्ति च तान्मृधे ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति