शान्ति पर्व  अध्याय २६१

कपिल उवाच

अनारम्भाः सुधृतय़ः शुचय़ो व्रह्मसंश्रिताः |  २०   क
व्रह्मणैव स्म ते देवांस्तर्पय़न्त्यमृतैषिणः ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति