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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
यश्च तेषां प्रणेता वै वासुदेवो महावलः |  २७   क
न स संनह्यते राजन्निति मामव्रवीद्वचः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति