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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्याहं वदतः सूत वहुशो मम संनिधौ |  २८   क
युक्तितो ह्यनुपश्यामि निहतान्पाण्डवान्मृधे ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति