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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
अहो वत महद्दुःखं यदहं पाण्डवान्रणे |  ३   क
क्षेमिणश्चाव्ययांश्चैव त्वत्तः सूत शृणोमि वै ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति