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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणश्च व्राह्मणो यत्र सर्वशस्त्रास्त्रपारगः |  ३१   क
निहतः पाण्डवैः सङ्ख्ये किमन्यद्भागधेय़तः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति